कुरुक्षेत्र 22 सितंबर लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय हिसार के प्रवक्ता ने कहा कि लम्पी स्किन डिजीज (एलएसडी) मुख्य रूप से गाय एवं अन्य गौवंशीय पशुओं को प्रभावित करने वाली एक संक्रामक विषाणु जनित बीमारी है। यह बीमारी लम्पी स्किन डिजीज वायरस (एलएसडीवर) के कारण होती है, जो पॉक्स विरिडी परिवार तथा कैप्रिपॉक्सवायरस समूह से संबंधित है। यह बीमारी जेनेटिक नहीं है और मनुष्यों के स्वास्थ्य के लिए प्रत्यक्ष खतरा नहीं मानी जाती। हालांकि, इससे पशुपालकों को दूध उत्पादन में कमी, पशुओं की शारीरिक स्थिति में गिरावट, प्रजनन संबंधी समस्याएं, चमड़ी को नुकसान, उपचार पर होने वाला खर्च तथा गंभीर मामलों में पशु की मृत्यु के कारण आर्थिक नुकसान हो सकता है।
उन्होंने कहा कि बीमारी में सामान्यतः: तेज बुखार के साथ त्वचा पर कई गोल, कठोर और उभरी हुई गांठें दिखाई देती हैं। ये गांठ बुखार शुरू होने के कुछ दिनों बाद स्पष्ट हो सकती है तथा संक्रमण के लगभग 1 से 3 सप्ताह बाद भी दिखाई दे सकती है। प्रभावित पशुओं में शरीर की लसीका ग्रंथियों में सूजन, पैरों, पेट के निचले हिस्से एवं थन के आसपास सूजन, भूख कम होना, कमजोरी, वजन कम होना, दूध उत्पादन में कमी तथा प्रजनन संबंधी समस्याएं भी देखी जा सकती है। गंभीर मामलों में, विशेषकर जब बीमारी के साथ दूसरा संक्रमण, शरीर में पानी की कमी, लंबे समय तक बुखार या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं जुड़ जाएं, तो पशु की स्थिति गंभीर हो सकती है। लम्पी स्किन डिजीज का वायरस मुख्य रूप से मच्छरों, काटने वाली मक्खियों और ट्रिक्स जैसे खून चूसने वाले कीटों के माध्यम से फैलता है। गर्म और नमी वाले मौसम में इन कीटों की संख्या एवं गतिविधि बढ़ने के कारण बीमारी के फैलने का खतरा भी बढ़ सकता है। संक्रमित या बीमारी की शुरुआती अवस्था में मौजूद पशुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने से भी बीमारी नए क्षेत्रों में पहुंच सकती है।
उन्होंने कहा कि पशुशाला एवं आसपास पानी जमा न होने दें और कीटों के प्रजनन वाले स्थानों को साफ रखें। पशुओं तथा उनके आसपास की जगह पर कीटनाशक अथवा टिक नियंत्रण की दवा का उपयोग केवल अनुशंसित मात्रा और पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार किया जाए। यदि बीमारी से किसी पशु की मृत्यु हो जाए तो शव को खुले में न छोड़ें और निर्धारित पशु चिकित्सा एवं जैव-सुरक्षा दिशा-निर्देशों के अनुसार सुरक्षित तरीके से निपटान करें। पशुओं की नियमित निगरानी की जाए और किसी भी पशु में बुखार, त्वचा पर गांठ, लसीका ग्रंथियों में सूजन, कमजोरी, भूख कम होना या दूध उत्पादन में कमी जैसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत संबंधित पशु चिकित्सा अधिकारी को सूचना दी जाए। स्वस्थ एवं टीकाकरण के लिए योग्य पशुओं का एलएसडी के विरुद्ध टीकाकरण पशुपालन विभाग द्वारा जारी वर्तमान दिशा-निर्देशों के अनुसार करवाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लम्पी स्किन डिजीज से बचाव के लिए बीमारी की समय पर पहचान, प्रभावित पशुओं को अलग रखना, सही नमूना लेकर समय पर जांच करवाना, पशुओं की अनावश्यक आवाजाही रोकना, मच्छर-मक्खियों एवं टिक्स पर नियंत्रण रखना, पशुशाला की साफ-सफाई बनाए रखना, स्वस्थ पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाना तथा पशु चिकित्सकों को तुरंत सूचना देना बेहद जरूरी है। पशुपालकों से अपील है कि पशुओं में तेज बुखार या त्वचा पर गांठ जैसे लक्षण दिखाई देने पर घबराएं नहीं और स्वयं उपचार करने के बजाय तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक या संबंधित पशु चिकित्सा अधिकारी से संपर्क करें। समय पर पहचान और सही उपचार एवं नियंत्रण उपायों से बीमारी के फैलाव को कम करने तथा पशुपालकों के आर्थिक नुकसान को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
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