- फसल अवशेष प्रबंधन को जन आंदोलन बनाकर पराली जलाने की प्रथा को रोकें किसान--पराली से विभिन्न उत्पाद तैयार कर किसान बढ़ा सकते हैं अपनी आमदनी: एडीसी प्रदीप कौशिक
- प्राकृतिक खेती अपनाकर मिट्टी की उर्वरता और फसल की गुणवत्ता में करें सुधार
जींद, 13 अक्टूबर एडीसी प्रदीप कौशिक ने कहा कि पराली जलाने से न केवल वायु प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही खेतों में मौजूद छोटे-छोटे जीव-जंतु जो हमारी भूमि को उपजाऊ बनाते है, वो भी आग की चपेट में आकर नष्ट हो जाते हैं, जिससे पर्यावरण का संतुलन प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि फसल अवशेषों का कृषि विभाग की हिदायत अनुसार तथा वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करके पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ भूमि की उर्वरता को भी बनाए रखा जा सकता है। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि वे पराली को आग लगाने के बजाय उसका उचित प्रबंधन करें। यह संदेश एडीसी ने मंगलवार को कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा आयोजित जिला स्तरीय फसल अवशेष प्रबंधन कार्यशाला में किसानों को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए दिया। इस मौके पर कृषि विभाग द्वारा कृषि यंत्रों के लिए लगाई गई प्रदर्शनी का भी एडीसी ने अवलोकन किया। इस अवसर पर कृषि विभाग के उपनिदेशक डाॅ सुखदेव कम्बोज,डाॅ सुभाष, साइंटिस्ट साहिल,प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की साइंटिस्ट डाॅ जिज्ञासा,नरेन्द्र पाल,विभिन्न खंडों के बीडीपीओ तथा सरपंच, नंबरदार व भारी मात्रा में किसान उपस्थित रहे।
एडीसी प्रदीप कौशिक ने कहा कि पराली केवल कृषि अवशेष नहीं, बल्कि आय बढ़ाने का एक अतिरिक्त साधन भी बन सकती है। किसान पराली से मवेसियों के चारे के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के उपयोगी उत्पाद तैयार कर सकते हैं। जैसा कि कार्यशाला स्थल पर लगाई गई प्रदर्शनी में भी पराली से तैयार उत्पादों को प्रदर्शित किया गया, जिससे किसानों को फसल अवशेषों के बेहतर उपयोग की संभावनाओं के बारे में जानकारी मिलती है। एडीसी ने बताया कि जिला प्रशासन द्वारा पिछले दिनों आयोजित ग्राम सभाओं में भी फसल अवशेष प्रबंधन को लेकर प्रस्ताव पारित किए गए थे। ग्राम पंचायतों, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों को इस दिशा में मिलकर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि गांव स्तर पर फसल अवशेष प्रबंधन के लिए गठित टीमों के साथ कृषि विभाग और पंचायत विभाग समन्वय स्थापित कर किसानों को जागरूक करें। किसानों को पराली जलाने से होने वाले नुकसान के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाए, ताकि वे स्वयं जागरूक होकर दूसरों को भी इसके प्रति प्रेरित कर सकें। उन्होंने कृषि विभाग की ओर से खेतों में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं पर सैटेलाइट के माध्यम से रखी जा रही निगरानी का उल्लेख करते हुए कहा कि किसानों को नियमों का पालन करना चाहिए और पराली प्रबंधन के वैकल्पिक उपायों को अपनाना चाहिए। उन्होंने इस अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाने वाली ग्राम पंचायतों और जनप्रतिनिधियों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि सामूहिक सहयोग से ही पराली जलाने की समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता और आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य को ध्यान में रखते हुए फसल अवशेष प्रबंधन को अपनी जिम्मेदारी समझें। पराली का उचित प्रबंधन करके किसान स्वच्छ पर्यावरण बनाए रखने के साथ-साथ टिकाऊ खेती और अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में भी योगदान दे सकते है।
एडीसी ने कहा कि कृषि क्षेत्र में आधुनिकीकरण और नई तकनीकों के इस्तेमाल से फसलों की पैदावार में तो वृद्धि हुई है, लेकिन रासायनिक खादों एवं अन्य संसाधनों के असंतुलित इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इसलिए अब समय आ गया है कि किसान खेती की ऐसी पद्धतियां अपनाएं, जिनसे भूमि की उर्वरता बनी रहे और फसलों की गुणवत्ता में भी सुधार हो। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना, जैविक खाद, गोबर की खाद और केंचुआ खाद का इस्तेमाल करना मिट्टी के साथ-साथ मावन जाति के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कृषि विभाग के उपनिदेशक डॉ. सुखदेव कम्बोज ने किसानों से आह्वान किया कि वे फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करें और पराली जलाने से बचें। पराली जलाने से पर्यावरण प्रदूषित होने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरा शक्ति और उसमें मौजूद लाभकारी जीवों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि किसानों को जागरूक होकर आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाना चाहिए, ताकि भूमि की गुणवत्ता बनाए रखने के साथ पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सके। उपनिदेशक ने कहा कि मिट्टी में अनेक ऐसे मित्र कीट और सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं, जो भूमि की उर्वरा शक्ति बनाए रखने तथा कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पराली जलाने से इन जीवों को नुकसान पहुंचता है। उन्होंने इस विषय को धार्मिक आस्था और जीवों के प्रति संवेदनशीलता से जोड़ते हुए कहा कि समाज में अनेक धार्मिक प्रवृत्ति के लोग चींटियों तथा अन्य छोटे जीव-जंतुओं के लिए सुबह के समय आटा, दाल और अन्य खाद्य पदार्थ डालते हैं। ऐसे में हमें अपने खेतों में भी इन जीवों के संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए और पराली जलाने से बचना चाहिए। जिले में पराली से संबंधित कार्य करने वाले कई लघु उद्योग स्थापित हो चुके हैं, जहां किसान फसल अवशेष बेचकर उनका सदुपयोग सुनिश्चित कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, पराली की गांठें बनाने के लिए स्ट्रॉ बेलर मशीन भी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हो रही हैं। इन मशीनों की सहायता से पराली को एकत्रित कर गांठों में बदला जा सकता है, जिससे इसके परिवहन, भंडारण और औद्योगिक उपयोग में सुविधा होती है।
उन्होंने बताया कि कृषि विभाग द्वारा गांवों की मैपिंग भी की गई है, ताकि क्षेत्रवार पराली प्रबंधन की व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सके। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा पराली प्रबंधन को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। किसानों को इस सुविधा का लाभ उठाते हुए फसल अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करना चाहिए। वहीं, पराली जलाने वाले किसानों के विरुद्ध नियमानुसार जुर्माने सहित अन्य निर्धारित प्रावधानों के तहत कार्रवाई भी की जा सकती है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे पराली को जलाने के बजाय इसे उपयोगी संसाधन के रूप में देखें। सामूहिक प्रयासों, आधुनिक कृषि यंत्रों और जागरूकता के माध्यम से पराली प्रबंधन को प्रभावी बनाया जा सकता है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति सुरक्षित रखने, वायु प्रदूषण कम करने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी।
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